श्री भारतवर्षीय दिगम्बर जैन तीर्थ संरक्षिणी महासभा

किसी भी संस्था के जन्म के मूल में क्रांति का बीज अवश्य रहता है। बिना इस बुनियाद के संस्था का जन्म होना सम्भव नही होता है आज से लगभग 117 वर्ष पूर्व भारत का दिगम्बर जैन समाज अत्यन्त बिखरा हुआ था, हालाकि विज्ञान क साधनो ने समय और क्षेत्र की दूरी को कम करना प्रारम्भ कर दिया था अतः समाज में साधन सम्पन्न होते हुए भी यह बात खटकती थी कि हमारा अखिल स्तर का संगठन कैसे संगठित हो । समय की मांग के अनुसार दिगम्बर जैन समुदाय में भी इस भावना का समावेश हुआ और यह भावना कार्य रूप में परिणित होने के आसार नजर आने लगें और समाज के सहयोग को पाकर महासभा ने एक विशाल वट व्क्ष का रूप लिया इन्ही धर्म के मूल सिद्धांतो रीति रिवाजो संस्कृतियों की रक्षा के लिए श्री भारतवर्षीय दिगम्बर जैन (धर्म संरिक्षणी) महासभा का जन्म हुआ श्री जम्बू स्वामी भगवान की निवाणर््ा भूमि चैरासी मथुरा में कार्तिक का मेंला पड़ता है इसी अवसर को मूर्तरूप दंेने के लिए उपयुक्त समझा गया और विक्रम सम्वत् 1949 सन् 1894 में महासभा की नीव डाली गयी इसके प्रथम सभापति मथुरा के सेठ लक्षमण दास जी उपसभापति सहारनपुर के लाला अग्रसेनजी रईस और मंत्री छेदालाल जी चुने गये ़। श्री भारतवर्षीय दिगम्बर जैन महासभा के 1981 में कोटा में आयेजित अधिवेशन में श्री निर्मल कुमार जैन सेठी एवं श्री त्रिलोकचंद जी कोठारी अध्यक्ष एवं महामंत्री निर्वाचित हुए। धर्म संरक्षिणी महासभा को पुनः सक्रिय करने के संकल्प के साथ यह भावना कालान्तर में बलवती हुई कि महासभा के 100 वर्ष से अधिक प्राचीन मंदिरों के कार्यो के संवर्धन एवं व्यापक कार्य क्षेत्र को देखते हुए एक स्वतंत्र किन्तु धर्म संरक्षिणी महासभा के अन्र्तगत श्री भारतवर्षीय दिगम्बर जैन (तीर्थ संरक्षिणी) महासभा का स्वतंत्र गठन किया जाए और उसकी स्थापना सन् 1998 में साकार हुई। तीर्थ संरक्षिणी महासभा प्राचीन जैन स्मारकों/मंदिरों के प्राचीन मूलस्वरूप को अक्षुण्ण रखते हुये जीर्णोद्धार/संरक्षण/संवर्द्धन करने में निरन्तर लगी हुयी है। इस योजना की समाज ने भरपूर सराहना करते हुये
हर दृष्टि से सहयोग दिया है और निरन्तर दे रही है। सभी आचार्यों, मुनियों, आर्यिकाओं व अन्य त्यागीवृंदों एवं समाज के श्रेष्ठीगणों व संस्थाओं ने इस कार्य के लिए आशीर्वाद एवं प्रेरणा दी है।

प्राचीन मंदिरों के जीर्णोद्धार एवं संरक्षण में पुरातत्वविदों एवं पुरातत्व इंजीनियरों का सक्रिय सहयोग लिया जा रहा है। समस्त राज्यों में इस योजना को समाज के हर वर्ग तक पहुंचाने के लिये संयोजक मनोनीत किये गये हैं।

उद्देश्य -

  • प्राचीन जैन धरोहरो-तीर्थ क्षेत्रों स्थापत्यों के अवशेषो, मूर्तियों एवं कला निधियों का समस्त भारतवर्ष में सर्वेंक्षण, संरक्षण, जीर्णोद्धार एवं संवर्धन।
  • उक्त उदे्श्यो की पूर्ति हेतु भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण एंव राज्यांे के पुरातत्व विभागो द्वारा जैन पुरातन स्थापत्य का सर्वेक्षण, उत्खनन, जीर्णोद्वार, संर्वधन की प्रेरणा एवं सहयोग देना।
  •  असुरक्षित बिखरे पडे़ जैन पुरातत्व वैभव के संरक्षण एंव संर्वधन के लिए ‘साईट म्यूजियमों’ की स्थापना।
  •  जैन पुरातत्व के जीर्णोद्धार के लिए समाज में जन चेतना पैदा करना और तन-मन-धन से सहयोग लेना।
  • प्राचीन जैन धरोहर पर शोध एंव जन चेतना हेतु तीर्थ संरक्षिणी महासभा की बेबसाइट का निर्माण एवं शोध पुस्तको पत्रिकाओं का प्रकाशन।
  • इस संस्था द्वारा समाज के सम्मुख एक योजना प्रस्तुत की जिसकी मुख्य बात है कि दान से प्राप्त राशि संचित नहीं की जायेगी बल्कि तुरन्त ही प्राचीन मंदिरों के जीर्णोद्धार में खर्च की जायेगी तथा दान दातार के नाम का पाटिया मंदिर में लगाया जायेगा।